उसे नई नई नौकरी मिली थी, देश का जाना माना न्यूज़ चैनल था। लेकिन इसके लिए उसे दिल्ली छोड़कर मुंबई जाना था। पहले तो जी में आया कि नहीं जाए... लेकिन मोटी तनख्वाह और घर की जरूरतों को देख उसने मुंबई जाने का फैसला कर लिया। आंखों में नए सपने और नई उम्मीदों के साथ वो मुंबई आ गया। दफ्तर का पहला दिन तो सबसे मिलने मिलाने और दफ्तर के तमाम हिस्से देखने में ही गुज़र गया। अगले दिन जब दफ्तर पहुंचा तो उसे लगा कि जैसे वो किसी रेलवे प्लेटफॉर्म पर खड़ा है। लोग यहां से वहां दौड़ रहे थे मानो ट्रेन पकड़ने की जल्दी हो। कुछ लोग ज़ोर ज़ोर से चीख रहे थे... लगा कुछ बेच रहे हों। तो कुछ लोग किसी जूनियर की क्लास लगाने में बिज़ी थे मानों रेलवे के टीटी हों। और उसे लगा कि वो इस प्लेटफॉर्म पर खड़ा वो भिखारी है जिसे देख तो सारे लोग दया की नज़रों से हैं लेकिन भीख देने के मूड में नहीं है। खैर धीरे धीरे वो भी इस प्लेटफॉर्म का आदी हो गया। उसका भी रोजगार चलने लगा। पहला महीना तो समंदर, लोकल ट्रेन, टैक्सी और मुंबई की कभी न थमने वाली रफ्तार को देखने में ही गुज़र गया।
दफ्तर में लोग उससे ज्यादा काम नहीं करवाते थे, उन्हें लगता कि अभी तो अखबार से आया है, काम की रफ्तार पकड़ने में वक्त लगेगा। वह कभी कुछ समझने की कोशिश करता तो कभी जानते हुए भी अनजान बनने की। दूसरा महीना बीतते बीतते उसे काफी कुछ समझ आने लगा। चूंकि अखबार में कई बरस काम कर चुका था इसलिए लिखने और मात्रा में गलतियों की गुंजाइश ना के बराबर थी, लेकिन कई बार उसकी लिखी स्क्रिप्ट को हाथ में लेकर टीवी के नए लौंडे भाव जमाने के लिए उसे समझाने लगते कि ये अखबार नहीं, टेलीविज़न है, यहां किताबी शब्दों का इस्तेमाल नहीं होता। वो मन मारकर चुप रह जाता। जान गया था कि ये बॉस के मुंहलगे हैं, कुछ बोले तो लेने का देना पड़ जाएगा। कुछ दिन पहले सुरेश जी ऐसे ही एक लड़के से उलझ गए। उसे एक शब्द का मतलब समझाने लगे। अगले दिन बॉस ने हकीकत शब्द में नुक्ता लगाने के मुद्दे पर उन्हें लपेटे में ले लिया। सबके सामने जमकर फजीहत हुई बेचारे की।
काम करते करते उसके कुछ दोस्त भी बन गए थे... इनमें से ज्यादातर हाशिए पर के ही लोग थे। न्यूज़ चैनल के दफ़्तर में आकर उसका परिचय पत्रकारिता के नए शब्दकोश से हुआ... जिसमें पेल दो, चढ़ जाओ, तान दो, खेल जाओ, काटो, बेच दो और ना जाने कितने द्विअर्थी शब्द थे। अगर एक बार ऐसे शब्द अपने घर में ले ले तो बाबू जी वो पिटाई करेंगे कि वो पत्रकारिता से तौबा कर ले। ख़ैर दिल्ली में अखबार के दिनों को यादकर उसे थोड़ा सुकून मिलता और इसी सुकून के दम पर वो टीवी का पत्रकार बनने की कोशिश में था।
काम करते करते उसने पाया कि दफ्तर में कुछ ऐसे लोग भी थे... जिनका फंडा था मूतो कम हिलाओ ज्यादा... इस शब्द से उसका सामना भी इसी दफ्तर में हुआ था। अभी उसे आए कुछ ही दिन हुए थे कि बाथरूम में उसकी मुलाकात सुरेंद्र से हो गई... वो कॉलेज के जमाने में उसका सीनियर हुआ करता था। उसने उसे नमस्ते किया तो उसने हालचाल लेने के बाद टीवी में तरक्की का फंडा बताया था। कहा बेटा अगर आगे बढ़ना है तो मूतो कम हिलाओ ज्यादा... बाद में उसने जाना कि इसका मतलब है करो कम चिल्लाओ ज्यादा। बाद में कई और लोगों ने भी समझाया कि टीवी में आगे बढ़ने का ये सबसे कारगर और आजमाया हुआ फंडा है। ऐसे लोगों से उसे बहुत डर लगता था... क्योंकि ये साले किसी की गलती पकड़ना ही अपना काम समझते थे। कोई गलती दिखी नहीं कि चिल्लाकर लगे काम का तरीका समझाने। और अगर अगल बगल बॉस नाम का जीव हो तो आवाज़ की बुलंदी और बढ़ जाती। बॉस के आते ही लगते समझाने कितनी बार कहा है ऐसे नहीं ऐसे लिखो... लेकिन तुम साले अखबार वाले सुधर नहीं सकते। लिखोगे वही किताबी ज्ञान। बॉस भी दो तीन गालीनुमा ज्ञानवर्धक डोज़ देकर अगले शिकार पर निकल जाता। लेकिन इस सारे खेल का खिलाड़ी उन्हें ये समझा देता कि काम तो वही करता है।
वक्त और मजबूरियों से समझौता करता हुआ वो खबरों को बेचने, तानने और पेलने की कला सीख रहा था। काम करते करते छह महीने बीत गए। दिसंबर का महीना था। उसकी मॉर्निंग शिफ्ट लगी थी। उसे इस शिफ्ट से बड़ी कोफ्त थी। कभी पढ़ने के लिए भी वो सुबह नहीं उठा... लेकिन माया महाठगिनी के चक्कर में उसे ये शिफ्ट भी करनी पड़ रही थी। सुबह चार बजे ही उठना होता था। और नहा धोकर पौने पांच तक तैयार होना पड़ता था... क्योंकि इसी वक्त दफ्तर की गाड़ी उसे लेने आती थी। अगर वो छूट गई तो सुबह सुबह कई जगह के धक्के खाने पड़ते थे। खैर धीरे धीरे उसकी आदत बनती जा रही थी। सुबह उठते ही वो टीवी ऑन कर देता, ताकि पता चल जाए कि रात भर की बड़ी खबरें क्या हैं... क्योंकि सुबह वही खबरें थोड़ी काट छांट करके चलानी होती थीं। एक सुबह जब वो उठा तो उसके कानों में एंकर का चीखता हुआ स्वर सुनाई दिया। ब्रश मुंह में लिए हुए वो बाथरूम से टीवी के पास पहुंचा। तो देखा ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी। मोटी मोटी लाल पट्टियों पर लिखा था कि मुंबई के एक इलाके में सात मंजिला इमारत ढह गई है। जिसमें दबकर डेढ़ दर्जन से ज्यादा लोग मर गए हैं। जबकि कई जख्मी हैं। खबर सुनकर वो सन्न रह गया...ढही इमारत के मलबे में दबे लोगों के शव और जख्मी लोगों की तस्वीरों को देख उसका दिल कराह उठा। उसने झट टीवी बंद किया और बाथरुम में घुस गया। ब्रश करना भूल वो आईऩे में खुद को देखने लगा। वो भी तो एक बहुमंजिली इमारत में ही रहता है। अगर ये इमारत ढह गई तो... इस कल्पना मात्र से ही उसके रोंगटे खड़े हो गए। इसके बाद तो जैसे एक के बाद कई ख्याल उसके मन में उमड़ने लगे। वो काफी दुखी हो उठा। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसका कोई अपना उस इमारत में दब गया है। भारी मन से दफ्तर जाने को तैयार हुआ... चाय भी नहीं पी। गाड़ी में पहुंचा तो देखा कि जयदेव पीछे की सीट पर उंघ रहा है। जयदेव उसका सीनियर था और सुबह की शिफ्ट का इंचार्ज भी था। दोनों एक ही मोहल्ले में रहते थे। गाड़ी में बैठते ही उसने जयदेव को रात के हादसे के बारे में बताया। वो उछल पड़ा.. भोर के धुंधलके में उसकी आंखें चमक उठीं जैसे पंजे में फंसे सियार को देख शेर की आंखें चमक उठती है। लगभग खुशी से चिल्लाते हुए कहा... गुरू हो गया आज का काम... मिल गई हेडलाइन... जयदेव का ये रूप देख उसे लगा मानो जयदेव पगला गया है... या फिर उसकी मानसिक दशा ठीक नहीं है। कहां तो डेढ़ दर्जन लोग मर गए हैं और कहां ये उनसे सहानुभूति रखने की बजाय खुश हो रहा है। उसने सर्द आवाज़ में कहा क्या कह रहे हैं सर, आपको पता है कितने लोग मर गए हैं? अबे सर के बच्चे... फालतू दिमाग मत खर्च कर... तुझे क्या पता ये आज की सबसे बड़ी खबर है... तुम देखना बेटा कैसे चार हेडलाइन बनाकर पेलता हूं... शब्दों को खास अंदाज़ में चबाते हुए उसने कहा, इस खबर को तो ऐसा तानूंगा... ऐसा तानूंगा कि बीएमसी और महाराष्ट्र सरकार तक की फट के हाथ में आ जाएगी। उसने कहा सर इसमें उन लोगों का क्या दोष है... इमारत पुरानी हो चुकी थी... बीएमसी ने उसे खाली करने का आदेश भी दे दिया था। लेकिन लोगों ने खाली नहीं किया और ये हादसा हो गया। मैं तो समझता हूं कि इसमें हमें ह्यूमन एंगल लेना चाहिए कि मुंबई जैसे शहर में जगह की इतनी किल्लत है कि लोग मरने को तैयार हैं लेकिन घर छो़ड़ने को नहीं... इतने सुनते ही जयदेव ने घूरकर उसे यूं देखा मानो कच्चा चबा जाएगा। फिर कहा साले यही तो तुम अखबार वालों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है... तुम साले लाख लिखना जान जाओ लेकिन खबर को बेचना नहीं सीख सकते। खैर इसके बाद उसने मुंह नहीं खोला। दफ्तर पहुंचने के बाद तो जयदेव की फुर्ती देखने लायक थी... भागकर असाइनमेंट में जाता तो कभी पीसीआर में... कभी डेस्क पर चिल्लाता तो कभी एंकर को डांटता। सुबह की पहली बुलेटिन में चारों की चारों हेडलाइन इमारत के ढहने पर ही थीं। किसी में हादसे का जिक्र, तो किसी में सरकार और बीएमसी के नाकारेपन की बात। जयदेव ने अपनी बात सच साबित कर दी। उसने लगातार 11 बजे तक ये खबर चलाई... मानों पूरी दुनिया में उस दिन इससे बड़ी कोई खबर ही नहीं हो। जो भी हो बॉस उसके काम से गदगद् थे। अगले दिन मेलबॉक्स... ग्रेट जयदेव, ब्रावो जयदेव, द रीयल जर्नलिस्ट और न जाने किन किन उपाधियों से नवाजे गए जयदेव की मेल से भरा पड़ा था। ये सब देख उसे काफी दुख हुआ। उसे लगा कि इन लोगों की इंसानियत मर गई है। इन्हें ना तो किसी के दुख दर्द से लेना देना है और ना ही किसी परेशानियों से इन्हें कोई वास्ता है। ऐसा लगता है इनकी संवेदनाएं मर चुकी हैं। इसी उधेड़बुन में वो दफ्तर का काम खत्म होने के बाद हाजी अली की दरगाह की ओर निकल पड़ा। वो मुस्लिम नहीं था लेकिन समुंदर के बीचोबीच बनी इस दगहाह में उसे काफी सुकून मिलता था। घंटों वहा बैठा रहा... सागर की लहरें आतीं उसके पैरों को छूकर चली जातीं... मानों उसका दर्द बांटने की कोशिश कर रही हों। अंधेरा होता देख वो वहां से घर लौट आया। धीरे धीरे वो इस हादसे को भूल गया।
इसी बीच सालाना अप्रेज़ल हुआ। जयवीर के काम से खुश बॉस ने उसकी तरक्की कर दी। तनख्वाह में अच्छे इज़ाफे के साथ मोटा बोनस भी मिला था। उसे आए अभी साल भर ही हुए थे इसलिए उसकी तनख्वाह में कोई बदलाव नहीं हुआ था। लेकिन जयवीर की तरक्की ने उसे एक राह जरूर दिखा दी थी। वक्त के साथ साथ वो भी खबरों को बेचने और तानने की कला में माहिर होने लगा। उसे लग रहा था कि वो बदल रहा है लेकिन कैसे ये उसकी समझ में नहीं आ रहा था... अब घर से फोन आता तो वो जल्दी ही बात करके रख देता। घरवालों की लंबी बातों से उसे झुंझलाहट होने लगती। दोस्तों से भी बातचीत का दायरा कम होने लगा। उसे न्यूज चैनल का दफ्तर और खबरों का कारोबार रास आने लगा था... लेकिन कभी कभी उसका अंतर्मन छटपटाने लगता... वो पूछता कि क्या यही सब करने आया था पत्रकारिता के क्षेत्र में। सालों पहले जब पत्रकारिता में नाम कमाने घर से निकला था तो कभी सोचा तक नहीं था कि ये सब करना पड़ेगा। लेकिन सिक्कों की खनक और कभी कभी मिलने वाली बॉस की शाबासी उसकी छटपटाहट पर पर्दा डाल देते थे। खुद को तसल्ली देने के लिए कहता कि ये भी पत्रकारिता का ही एक अंग है।
वक्त बीतने के साथ तो वो हर शिफ्ट में काम करने में माहिर हो गया था। क्या सुबह, क्या दोपहर और क्या रात... इस महीने फिर उसकी मॉर्निग शिफ्ट लगी थी। वही दिनचर्या थी, तड़के चार बजे उठना और पौने पांच बजे तक गाड़ी में बैठ जाना। दफ्तर का माहौल उसे इतना रास आने लगा था कि काम खत्म होने के बाद भी वो वहीं रुकने लगा था। धीरे धीरे बॉस की नज़र उस पर पड़ने लगी थी। कभी कभी वो उसका हाल चाल पूछ लेते। हाजी अली की दरगाह पर गए उसे महीनों बीत गए थे। अब समंदर की लहरें उसे अपने पास नहीं बुलाती थीं। उसे लगता कि अब उसके पास वहां जाने के लिए वक्त ही नहीं है। वक्त अपनी रफ्तार से गुज़र रहा था।
एक दिन सुबह उठा और आदत के मुताबिक टीवी खोल कर बाथरुम में घुस गया। अभी ब्रश हाथ में लिया ही था... कि एंकर की चीखती आवाज़ उसके कानों में पड़ी... एंकर पूरे जोश में चीख चीख कर बता रहा था कि मुंबई के फलां इलाके एक चार मंजिला इमारत ढह गई है, इसमें दब कर 11 लोगों की मौत हो गई है और दो दर्जन से ज्यादा जख्मी हैं। ये खबर सुन उसकी आंखें चमक उठी... इस बारे उसे दुख नहीं हुआ... उसकी आंखों में आंसू नहीं आए... बल्कि होठों पर एक कुटिल मुस्कान आ गई जिसे कोई नहीं देख पाया... आज उसे लोगों के मारे जाने का गम नहीं था... ना ही वो मुंबई में रहने की किल्लत के बारे में सोचकर परेशान था... बल्कि आज वो खुश था... क्योंकि उसे आज की सबसे बड़ी हेडलाइन मिल गई थी।
मंगलवार, 11 मार्च 2008
प्रोफेशनल
एक ज़माने बाद मिला था वो मुझसे। देखते ही गले लग गया। मैं बहुत खुश था कि इस अनजानी भीड़ में एक शख्स तो जान पहचान का मिला। कॉलेज के दिनों में दोनों एक साथ पढ़ते थे। कुछ दिन तक हम साथ रहे भी। लेकिन उसके बाद नौकरी के चक्कर में हमारी राहें जुदा हो गई हैं। फिर तो महीनों लग जाते खबर पाने में। कई बार फोन किया... पर हर बार वो ना जाने किन कामों में व्यस्त रहता था। सोचा काफी तरक्की कर रहा है दोस्त। मन ही मन खुश हो लिया। आज तकरीबन डेढ़ साल बाद मुलाकात हुई। मेरी खुशी का अंदाजा नहीं था। मैं उससे काम और परिवार के सिलसिले में पूछ रहा था। लेकिन वो लगातार मेरी ओर नहीं देखकर गेट की ओर टकटकी लगाए देख रहा था। बातों बातों में पता चला कि उसने काफी तरक्की कर ली है। मैं बोले जा रहा था और वो बस हूं-हां में जवाब दे रहा था। उसकी नज़रें लगातार किसी को ढूंढ रही थीं। तभी अचानक गेट पर एक लंबी सी कार दिखी। उसमें से सूटेड बूटेड शख्स उतरा। उसे देख उसकी आंखों में चमक आ गई। मैंने उस शख्स के बारे में पूछा तो उसने कहा कंपनी का मालिक है। देखते ही देखते वो मुझे छोड़ लपककर उसके पास चला गया। मैं कभी खुद को तो कभी अचानक उसके शरीर में आई फुर्ती को देख रहा था। वो अपने साहब के साथ मेरे सामने से यूं निकला मानो मुझे पहचानता ही नहीं। थोड़ी देर बाद मैंने देखा वो हाथों में शराब का प्याला लिए गप्पे लड़ा रहा है। मैं उसके पास पहुंचा और कहा तुम तो शराब को हाथ नहीं लगाते थे... उसने मुझे तुच्छ नज़रों से देखते हुए कहा कि तुम हमेशा छोटे लोगों वाली बात करोगे। अबे साहब ने खुद अपने हाथों से पैग बनाकर दिया है। मैंने कहा इससे क्या फर्क पड़ता है। उसने उपहास भरी हंसी हंसते हुए कहा बेटा यही तो असल फर्क है... यही तो प्रोफेशनलिज़्म है। आगे बढ़ना है तो प्रोफेशनल बनना पड़ेगा... नहीं तो रेंगते रह जाओगे। इतना कहकर वो अपने तथाकथित प्रोफेशनल दोस्तों के साथ जाम टकराने लगा। मैं ठगा सा खड़ा प्रोफेशनल शब्द के मायने ढूंढने लगा।
बुधवार, 3 अक्टूबर 2007
मां
वह अभी बिस्तर पर ही था कि मोबाइल की घंटी बजी। रात को ऑफिस से देर से लौटा था... फोन उठाने का मन नहीं था। फिर भी अनमने भाव से फोन उठाया। मां का फोन था। हालचाल पूछने के बाद मां ने कहा कि इस बार दीवाली में घर आ जाओ। पिछली बार ना तो होली में घर आए और ना ही दीवाली में। उसने बेमन से कहा, हां मां, पूरी कोशिश करुंगा। नींद टूट चुकी थी। उसने सोचा चलो चाय ही पी ली जाए। बाहर निकला तो दिमाग में मां की बात घूम रही थी। सोच रहा था कि मां ने तो बस कह दिया कि घर चले जाओ। उन्हें क्या पता कि कितना झाम होता है छुट्टी लेने में। बॉस के सामने यूं गिड़गिड़ाना पड़ता है मानों भीख मांग रहे हों। उपर से एक दिन ज्यादा छुट्टी ले ली तो तनख्वाह कटती है सो अलग। और आने जाने में भी हजार-दो हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। घर जाओ तो सबके लिए कुछ लेकर तो जाना ही पड़ता है। उसने सोचा मां से बहाना बना दूंगा कि छुट्टी नहीं मिल रही है। इसी उधेड़बुन में वो चाय की दुकान की ओर बढ़ा जा रहा था। तभी सामने से एक बच्चा अपनी छोटी सी साइकिल चलाते दिखा। उसे ठीक से साइकिल चलानी नहीं आ रही थी। डगमगाते हुए वो सड़क पर गिर पड़ा। उसके मुंह से जोर की चीख निकली... उसके घुटने छिल गए थे। मासूम आंखें डबडबा गईं पर वो रोया नहीं। तभी बच्चे की चीख सुन उसकी मां दौड़कर वहां पहुंची। उसने उसे छाती से लगा लिया। मां का प्यार पाकर बच्चा जोर से रोने लगा। मानो अब उसे दर्द का पता चला हो। मां उसे पुचकारते हुए घर के भीतर चली गई। ये देख उसे भी अपने बचपन की एक घटना याद आ गई। जब वह पहली बार साइकिल से गिरा था तो उसके घुटनों से बहता खून देख मां की आंखों में आंसू आ गए थे। चोट पर दवा लगाते वक्त कितना रोई थी मां। ये सोचकर उसकी आंख भर आई। वो चाय की दुकान पर पहुंच चुका था... लेकिन उसके पैर नहीं थमे। वो चलता ही जा रहा था... उसे जल्दी से जल्दी रिजर्वेशन सेंटर जो पहुंचना था।
मंगलवार, 2 अक्टूबर 2007
मदद
वो अपने छोटे से शहर से नया नया दिल्ली आया था। दूर के रिश्ते के भाई के साथ जमुना पार के इलाके में रहने लगा। हफ्ते भर की भाग दौड़ के बाद उसे शहर की एक बड़ी सी बिल्डिंग की चौकीदारी का काम मिला। रात की ड्यूटी थी। वह बड़ी मुस्तैदी से अपना काम करता था। उस दिन भी उसकी रात की ड्यूटी थी... वह साइकिल से काम पर निकला। आईटीओ पुल पार कर वह मंडी हाउस पहुंचा। रात काफी गहरी हो चुकी थी। कुछ गाड़ियों के अलावा इक्का दुक्का लोग ही रास्ते में नजर आ रहे थे। वह अपनी ही धुन में चला जा रहा था तभी उसने एक औरत के चीखने की आवाज सुनी... उसने देखा कि एक औरत बदहवास भागे जा रही है। उसने अपनी साइकिल उसके पास रोक दी। उस औरत से कुछ पूछ पाता इससे पहले ही तीन-चार हट्टे कट्टे लोगों ने उसे घेर लिया। तभी उस औरत ने कहा, अबे ओ देख क्या रहा है। चल जल्दी से अंटी ढीली कर। जितने पैसे हैं हथेली पर धर दे, नहीं तो! नहीं तो, क्या कर लेगें आप लोग? उसने थूक निगलते हुए कहा। तभी उनमें से एक ने लंबा सा चाकू निकाल लिया। चाकू देखते ही उसने अपनी जेब में रखे सारे रुपए उस औरत के हाथ पर रख दिए। पैसे मिलते ही वो औरत और उसके साथी अंधेरे में गुम हो गए। वो मन ही मन रोता हुआ अपनी ड्यूटी के लिए चल पड़ा। जाते वक्त वो बुदबुदा रहा था, मां कसम आज के बाद इस शहर में किसी की मदद नहीं करुंगा।
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