मंगलवार, 11 मार्च 2008
प्रोफेशनल
एक ज़माने बाद मिला था वो मुझसे। देखते ही गले लग गया। मैं बहुत खुश था कि इस अनजानी भीड़ में एक शख्स तो जान पहचान का मिला। कॉलेज के दिनों में दोनों एक साथ पढ़ते थे। कुछ दिन तक हम साथ रहे भी। लेकिन उसके बाद नौकरी के चक्कर में हमारी राहें जुदा हो गई हैं। फिर तो महीनों लग जाते खबर पाने में। कई बार फोन किया... पर हर बार वो ना जाने किन कामों में व्यस्त रहता था। सोचा काफी तरक्की कर रहा है दोस्त। मन ही मन खुश हो लिया। आज तकरीबन डेढ़ साल बाद मुलाकात हुई। मेरी खुशी का अंदाजा नहीं था। मैं उससे काम और परिवार के सिलसिले में पूछ रहा था। लेकिन वो लगातार मेरी ओर नहीं देखकर गेट की ओर टकटकी लगाए देख रहा था। बातों बातों में पता चला कि उसने काफी तरक्की कर ली है। मैं बोले जा रहा था और वो बस हूं-हां में जवाब दे रहा था। उसकी नज़रें लगातार किसी को ढूंढ रही थीं। तभी अचानक गेट पर एक लंबी सी कार दिखी। उसमें से सूटेड बूटेड शख्स उतरा। उसे देख उसकी आंखों में चमक आ गई। मैंने उस शख्स के बारे में पूछा तो उसने कहा कंपनी का मालिक है। देखते ही देखते वो मुझे छोड़ लपककर उसके पास चला गया। मैं कभी खुद को तो कभी अचानक उसके शरीर में आई फुर्ती को देख रहा था। वो अपने साहब के साथ मेरे सामने से यूं निकला मानो मुझे पहचानता ही नहीं। थोड़ी देर बाद मैंने देखा वो हाथों में शराब का प्याला लिए गप्पे लड़ा रहा है। मैं उसके पास पहुंचा और कहा तुम तो शराब को हाथ नहीं लगाते थे... उसने मुझे तुच्छ नज़रों से देखते हुए कहा कि तुम हमेशा छोटे लोगों वाली बात करोगे। अबे साहब ने खुद अपने हाथों से पैग बनाकर दिया है। मैंने कहा इससे क्या फर्क पड़ता है। उसने उपहास भरी हंसी हंसते हुए कहा बेटा यही तो असल फर्क है... यही तो प्रोफेशनलिज़्म है। आगे बढ़ना है तो प्रोफेशनल बनना पड़ेगा... नहीं तो रेंगते रह जाओगे। इतना कहकर वो अपने तथाकथित प्रोफेशनल दोस्तों के साथ जाम टकराने लगा। मैं ठगा सा खड़ा प्रोफेशनल शब्द के मायने ढूंढने लगा।
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