बुधवार, 3 अक्टूबर 2007

मां

वह अभी बिस्तर पर ही था कि मोबाइल की घंटी बजी। रात को ऑफिस से देर से लौटा था... फोन उठाने का मन नहीं था। फिर भी अनमने भाव से फोन उठाया। मां का फोन था। हालचाल पूछने के बाद मां ने कहा कि इस बार दीवाली में घर आ जाओ। पिछली बार ना तो होली में घर आए और ना ही दीवाली में। उसने बेमन से कहा, हां मां, पूरी कोशिश करुंगा। नींद टूट चुकी थी। उसने सोचा चलो चाय ही पी ली जाए। बाहर निकला तो दिमाग में मां की बात घूम रही थी। सोच रहा था कि मां ने तो बस कह दिया कि घर चले जाओ। उन्हें क्या पता कि कितना झाम होता है छुट्टी लेने में। बॉस के सामने यूं गिड़गिड़ाना पड़ता है मानों भीख मांग रहे हों। उपर से एक दिन ज्यादा छुट्टी ले ली तो तनख्वाह कटती है सो अलग। और आने जाने में भी हजार-दो हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। घर जाओ तो सबके लिए कुछ लेकर तो जाना ही पड़ता है। उसने सोचा मां से बहाना बना दूंगा कि छुट्टी नहीं मिल रही है। इसी उधेड़बुन में वो चाय की दुकान की ओर बढ़ा जा रहा था। तभी सामने से एक बच्चा अपनी छोटी सी साइकिल चलाते दिखा। उसे ठीक से साइकिल चलानी नहीं आ रही थी। डगमगाते हुए वो सड़क पर गिर पड़ा। उसके मुंह से जोर की चीख निकली... उसके घुटने छिल गए थे। मासूम आंखें डबडबा गईं पर वो रोया नहीं। तभी बच्चे की चीख सुन उसकी मां दौड़कर वहां पहुंची। उसने उसे छाती से लगा लिया। मां का प्यार पाकर बच्चा जोर से रोने लगा। मानो अब उसे दर्द का पता चला हो। मां उसे पुचकारते हुए घर के भीतर चली गई। ये देख उसे भी अपने बचपन की एक घटना याद आ गई। जब वह पहली बार साइकिल से गिरा था तो उसके घुटनों से बहता खून देख मां की आंखों में आंसू आ गए थे। चोट पर दवा लगाते वक्त कितना रोई थी मां। ये सोचकर उसकी आंख भर आई। वो चाय की दुकान पर पहुंच चुका था... लेकिन उसके पैर नहीं थमे। वो चलता ही जा रहा था... उसे जल्दी से जल्दी रिजर्वेशन सेंटर जो पहुंचना था।

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